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Pragya Institute of Personality Development- Kingdom Of Wisdom.

  • किसान की घड़ी : प्रेरणादायक कहानी

    • 2019-07-30 11:30:00
    • Posted By : Admin

    एक दिन एक किसान की घड़ी कहीं गुम हो गई. पिता से उपहार स्वरुप प्राप्त वह घड़ी उसे अतिप्रिय थी. वह उससे वह भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ था.

    उसने घर के हर कमरों में, आंगन में, बाड़ी में लगभग हर उस स्थान पर जहाँ घड़ी के होने की संभावना थी, में उसे तलाशा, लेकिन वह नहीं मिली.

    थक-हारकर उसने अड़ोस-पड़ोस के बच्चों को बुलाया और उन्हें घड़ी खोजने का काम सौंपा. उसने घड़ी खोजने वाले बच्चे के लिए १०० रुपये का इनाम रखा.

    बच्चे घड़ी की तलाश में जुट गए. काफ़ी देर तक वे घड़ी को खोजते रहे, लेकिन उन्हें घड़ी नहीं मिली. धीरे-धीरे सभी बच्चों ने हार मान ली. किसान भी अपना मन मसोस कर रह गया. उसे भी लगने लगा कि अब उसकी घड़ी कभी नहीं मिलेगी.

    सभी एक स्थान पर बैठे हुए थे, तभी एक बच्चे ने किसान से कहा कि वह अकेले में शांति से उस घड़ी को खोजना चाहता है.

    किसान ने सोचा, चलो एक प्रयास और सही. उसने उस बच्चे को इज़ाज़त दे दी.

    बच्चा घर के भीतर गया और सभी कमरों में खोजने के बाद वह जब बाहर आया, तो उसके हाथ में घड़ी थी.

    किसान घड़ी पाकर बहुत खुश हुआ. उसने बच्चे से पूछा, “हम सभी ने घड़ी हर जगह खोजी थी. हमें तो यह नहीं मिली, फिर तुम्हें कैसे मिल गयी?”

    बच्चे ने उत्तर दिया, “मैं हर कमरे में जाकर शांत होकर घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ पर अपना ध्यान केंद्रित करने लगा. शांति होने के कारण मुझे घड़ी की आवाज़ सुनाई पड़ गई और मैंने उसे खोज लिया.”

    घड़ी और कहीं नहीं बल्कि किसान की लकड़ी की अलमारी के पीछे थी.

    किसान ने बच्चे को इनाम देकर वापस भेजा.

    दोस्तों, कमरे की शांति के कारण बच्चे को घड़ी खोजने में मदद मिली. उसी तरह मन की शांति से हमें जीवन की दिशा निर्धारित करने में मदद मिलती है. इसलिए हमें रोजाना अपने लिए कुछ वक़्त अवश्य निकालना चाहिए और शांति से बैठकर मनन करना चाहिये. उस शांति में ही हमें अपने मन की बात सुनाई पड़ेगी, जो जीवन को समझने और उसके हिसाब से आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है. अन्यथा दुनिया की शोर-गुल में हम कभी भी अपने मन की बात समझ नहीं पाएंगे और वही करते रहेंगे, जैसा दूसरे हमसे कहेंगे और हम दूसरों के दिखाए रास्ते पर ही बढ़ते चले जायेंगे. फिर बाद में हमें पछताव होगा कि हमने अपने दिल की क्यों नहीं सुनी. जबकि वास्तविकता तो यह होगी कि हमने दिल की बात सुनने के लिए कभी वक़्त निकाला ही नहीं.


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